शक (सीथियन) शासक
( दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 120 ईसा पूर्व) से लेकर चौथी शताब्दी ईस्वी (395 ईस्वी))
शक पार्थियन संघर्ष :
1. पार्थियन, राजा फ्राटेस तथा राजा आर्टानेबस की मृत्योपरांत मिथ्रदात द्वितीय द्वारा परास्त हुए।
शाखाएं : शकों की पांच शाखाएं थीं ।
1. अफगानिस्तान
2. पंजाब (राजधानी - तक्षशिला )
3. मथुरा
4. पश्चिम भारत
5. उपरी दक्कन
भारत में शक राजा स्वयं को क्षत्रप कहते थे।
पंजाब के क्षत्रप : पंजाब में तीन वंश के क्षत्रप हुए :
1. कुसुलुक वंश : लियक तथा पतिक इस वंश के प्रमुख शासक थे।
2. जिहोनिक वंश : मनिगुल तथा जिहोनिक इस वंश के प्रमुख शासक थे।
3. इन्द्रवर्मन वंश : इस वंश के प्रमुख शासक इन्द्रवर्मन तथा अस्पवर्मन थे।
मथुरा के क्षत्रप : हगान तथा हगामस मथुरा के प्रथम क्षत्रप थे। इनके बाद राजवुल व षोडश क्षत्रप बने। जैन ग्रंथ कालकाचार्य कथानक के अनुसार मालवा में विक्रमादित्य से परास्त हो कर शक मथुरा में बस बए थे। शकों ने मथुरा को शुंगों से जीता था। सिंहशीर्ष अभिलेख (मथुरा) के अनुसार राजवुल मथुरा का प्रथम शक क्षत्रप था। इसके सिक्कों व मोरा अभिलेख में इसे महाक्षत्रप कहा गया है। सिंहषीर्ष अभिलेख राजवुल की प्रधान पटरानी ने उत्कीर्ण कराया था। राजवुल के उत्तराधिकारी षोडाष को आमोहिनी दानपत्र में महाक्षत्रप कहा है। सिक्कों पर षोडाश के उत्तराधिकारियों में तोरणदास का नाम मिलता है।
इसके उपरांत मथुरा पर कुषाणों नें अपना साम्रज्य स्थापित कर लिया।
तक्षशिला के क्षत्रप : तक्षशिला का प्रथम शासक मोआ(मोगा/मोअस ) ई0पू0 20 से ई0पू0 5 तक शासक बना इसे तक्षशिला के ताम्रपत्र लेख में महाराय कहा गया है। इसने यवनों को हरा कर गांधार जीता एवं तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाई। इसके पष्चात यवनों से सम्पूर्ण पंजाब जीत लिया। मोअस की मुद्रओं में यूनानी देवता, बुद्ध तथा शिव की आकृतियां मिलती हैं। मोअस के बाद अय(अजेस ) ई0पू0 5 से ईस्वी 30 तक शासक बना। इसे ही सम्पूर्ण पंजाब को जीतने श्रेय प्राप्त है। उसके बाद अयलिस व अय द्वितीय शासक बने। ईस्व सन् 44 के लगभग गोण्डोफर्नीज ने कन्धार जीत लिया।
महाराष्ट के क्षत्रप : भूमक महाराष्ट में क्षहरात वंषीय क्षत्रपों के राज्य का संस्थापक माना जाता है। भूमक के सिक्के गुजरात, काठियावाड़ तथा मालवा क्षेत्र से प्राप्त होते है। ये सिक्के ब्राम्ही तथा खरोष्ठी लिप्यांकित हैं।
नहपान ( ई0 119. से ई0 125. तक ) : यह क्षहरात वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा था। इसके चांदी व ताम्र सिक्के, जो कि अजमेर से नासिक तक प्राप्त हुए हैं। पर इसकी उपाधि ‘‘ राजन ’’ अंकित है। नहपान के दामाद उषावदत्त के नासिक गुहा अभिलेख से ज्ञात होता है कि नहपान का राज्य राजपुताना तक फैला हुआ था। ‘‘ पेरीप्लस ऑफ इरीथ्रियन सी ’’ के आात लेखक के अनुसार नहपान की राजधानी भिन्नगर थी। नहपान को परास्त कर गौतमीपुत्र शातकर्णि ने इसके सिक्के (जोगलथम्बी से प्राप्त) पुनरांकित कराए।
नहपान के साथ ही क्षहरात वंश का अंत हो गया।
अवन्ति के क्षत्रप : उज्जियिनी में यशोमतिक ने एक स्वतंत्र शक राज्य की स्थापना की। इस नवीन कादर्मक वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक चष्टण था। इसका वर्णन टॉलेमी ने अपने भूगोल में टियेस्टन के नाम से किया है तथा इसकी राजधानी उज्जैन को बताया है। चष्टन, पूर्व में कुषाणों के अधीन सिंध प्रदेश का क्षत्रप था। कुछ विद्वानों के अनुसार चष्टन ही शक संवत का संस्थापक माना जाता है क्योंकि इसने अपने अभिलेखों में शक संवत का प्रयोग किया है।
जयदामन ( (लगभग 130 ईस्वी के आसपास): चष्टण ने इसे ही क्षत्रप बनाया था किन्तु इसके असामयिक निधन हो जाने पर चष्टण ने अपने पौत्र रूद्रदामन को क्षत्रप बनाया।
रूद्रदामन ( ई0 130 से ई0 150 तक ) : भारत के शक शासकों में यह सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। अंधौ (कच्छ)अभिलेख से ज्ञात होता है कि यह अपने दादा चष्टण के साथ 7 साथ सामानांतर रूप से सत्ता का भागीदार था। (यह भारतीय इतिहास में एक साथ दो राजाओं द्वारा साथ - साथ शासन करने का प्रथम उदाहरण है।) रूद्रदामन का प्रशस्ति लेख, जूनागढ़ से ज्ञात होता है इसने यौधेयों को हराया तथा दो बार सातवाहनों को हराया। वाशिष्ठिपुत्र को अपना संबंधी (संभवतः दामाद) होने के कारण बख्श दिया था। ( कुछ विद्वान कन्हेरी के लेख के आधार पर शिव श्री शातकर्णि को रूद्रदामन का दामाद मानते हैं ।) प्रथम एतिहासिक लेख (जूनागढ़) जो काव्य रूप में संस्कृत भाषा में रचित है के अनुसार रूद्रदामन ‘ भ्रष्टराज प्रतिष्ठापक ’’ माना गया है। रूद्रदामन ने सुदर्शन झील का पुनः निर्माण अपने प्रांतपति सुविश्वास के नेतृत्व में कराया था। रूद्रदामन शब्द (व्याकरण), अर्थ (राजनीति), गंधर्व (संगीत) एवं न्याय (तर्क) हेतु सुविख्यात था। रूद्रदामन की मृत्यु ईस्वी सन् 150 में हुई।
रूद्रदामन के उत्तराधिकारी ( ई0 150 से ई0 395 लगभग तक ) : रूद्रदामन के पुत्र दाय समद, रूद्रसिंह प्रथम, जीव दामन, रूद्रसेन प्रथम हुए। अंतिम शक क्षत्रप रूद्रसिंह तृतीय को मार कर गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ने भारत से शक सत्ता का उन्मूलन कर दिया।
स्मरणीय तथ्य :
· शकों ने पुरानी प्रथा युक्त यूनानी तथा प्राकृत भाषा में त्रिभाषिक लेख युक्त सिक्के चलवाए।
· शक क्षत्रपों ने सर्वप्रथम तिथि युक्त सिक्के चलवाए।
· जैनाचार्य वृषभ ने अपने ग्रंथ तिलोयष्णति में शकों को भट्ट बाण कहा है।
· शक राजा एजेज ने यूनानी हिप्पोसटेटस को हराया था।
· रूद्रदामन कच्छ क्षेत्र (अंधौ) का निवासी था।
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